कल रात चाँद

कल रात चाँद से कहा था

कितनी दूर हो तुम पर कितने नजदीक लगते

गुमसुम हो फिर भी कितना कुछ कहते

जब तक रहू में आशिया की छत पर

तुम मेरे हर पल पास रहते

तुम यकीन हो मेरा की सबसे बड़ा भरम

चाँद ने कहा मुझसे ,,,,,में वही हु जो सब के लिए है

तुम बदलते इसीलिए तुम्हे सब बदले बदले लगते ।।

फलक

फलक से जा उतरा चाँद उसकी छत पर,
उसे बांहो में लिपटे खुद भी रोने लगा
रोज ही तड़प के तू मुझसे कहता है अपनी कही अनकही
बस अब मुझे तेरा ये दर्द मंजूर नही
चल फलक तक एक तारा बना दु
किसी और के दिये है ये जख्म
इसमे कसूर तेरा नही
तू रहना मेरे करीब हर पल
चल उठ थोड़ा गमो से फलक भी सजा दु
ये सारा आसमा ले ले तू ये जमी अब तेरी नही

बहुत चमकीले है ख्याव

बहुत चमकीले थे ,कांच के ख्याव

बहुत चमके ,बहुत भाये हमे

रोज रोज देखते थे हम बड़ी आस लगाकर

एक रोज टूटे उसे जख्म हाथ से लेकर दिल तक आये

ज़िंदा लाशें

सुबह से शाम तक वैसा ही मंज़र ,जैसे ज़िंदा हो ज़िंदा लाशें
मुस्कुराहटें वैसे ही चेहरे पर ,जैसे ज़िंदा हो ज़िंदा लाशें
नमी भी नही वाकी आंखों में उनके,
सुखी सुखी सी हो जैसे ये ज़िंदा लाशें
आम लोगो से जिस्म है इनके,
फिर क्यों ज़िंदा नही ,ये ज़िंदा लाशें
काठ की गुड़िया सी है ,दर्द से परे
खूबसूरत बहुत ,बेबस मगर ये ज़िंदा लाशें
कितनी बेपरवाह है ये
ज़िंदा नही जो ये ज़िंदा लाशें
मौत के बेहद करीब सी है
ज़िंदा नही जो ये ज़िंदा लाशें
कुछ गुमनाम सी गमगीन है
सीने में नासूर लिए क्यो अब भी जिंदा है ये ज़िंदा लाशें
बिल्कुल आम है इंशा जैसी
भीतर से मरी मरी ये ज़िंदा लाशें
नूर भी फीके पड़े है चेहरे से इनके
बेनूर सी फीकी है ये ज़िंदा लाशें
“ख्याब” भी हिस्सा है इनका,
ज़िंदा है मगर बैसे ही जैसे ज़िंदा है ये ज़िंदा लाशें