कांच के ख्याव

कांच के ख्याव है,

टूटने का डर भी है ,

कितने चमकीले है,

कुछ टूटे थे जिनके टुकड़े आज भी चुभते है

मगर कुछ और ख्याव देख लिए

क्या करे ये दिल है

दिमाग नही ,

नादानियां करता है बस

ख्यावो के टुकड़े चुभते बहुत है

ख्याव कांच के जो है

चुभने तो ,

अस्तित्व है ,

इंसानी सख्सियत के

चुभने दो,

तामीर करते है ,

कांच के ख्यावो को

पाक साफ है ,

ये ख्वाहिशो के साबुत

ये कांच के ख्याव

Advertisements

कोशिशें

कोशिश करती हूं
अपने कद से ऊँचा उछलने की
स्त्रीत्व में बंधे हुए
कुछ सपनो के परिदों को आसमा में आजाद कर दु
स्वप्न परिन्दों को पलको में छुपाया है अभी
बस आजाद करना है
पर डर है कही उन्हें देख कर कोई न मार डाले
छोटे छोटे ख्याब है
जीने के
मगर आजाद देखे है
बस वही डर है
कहा अच्छा है ख्यावो का यू आजाद रहना
और वो भी औरत के
नही नही ……………
श श………………कोई सुन न ले मैंने सुन लिया
चलो छुपा लू पलकों में अपनी
पलकों में सही ज़िंदा तो रहेंगे
कोई खत्म कर दे उससे अच्छा है
आंखों में लेकर ही मरु
में मेरे ख्याव
कोशिश करुँगी फिर कभी
किसी और के पूरे हो
ख्याव जरूरी है
ज़िन्दगी के लिए
कोशिश तो करनी होगी ही

मुझे नीद आती है

घास के तिनको पर एक रात को बना लिया बिछौना
नीद को काबू में करने चाँद को कुछ धीमा करके
बदलो के पीछे छुपा दिया है
बस टिमटिमाते तारो की धीमी रोशनी में,
शब आगोश में ,
शजर माथे को सहला कर लोरिया गाते ,
चली आओ अब तो तुम सारे इंतजाम कर लिए है,
बस तुम्हारा इंतज़ार है
क्योकि कुछ हकीमो ने कहा है
मुझे नीद नही आती है
रात भर जागकर कौन सोता है भला
कुछ लोगो ने भी कहा है
तुम्हे नीद नही आती
सारे इंतजाम आज कर लिए तुम्हारे लिए
बस आ जाओ तुम
मुझे भी कहना है तमाम लोंगो और हकीमो से
तुम मुझे भी आती हो
मुझे नीद आती है
मगर चुपचाप ही हम दोनों जागते जागते बतियाते है
न”” खुद ख्याब “”सोती है
और नीद को रात भर जगाती है
में कह दूँगी फिर मुझे नीद आती है
मुझे नीद आती है

कल रात चाँद

कल रात चाँद से कहा था

कितनी दूर हो तुम पर कितने नजदीक लगते

गुमसुम हो फिर भी कितना कुछ कहते

जब तक रहू में आशिया की छत पर

तुम मेरे हर पल पास रहते

तुम यकीन हो मेरा की सबसे बड़ा भरम

चाँद ने कहा मुझसे ,,,,,में वही हु जो सब के लिए है

तुम बदलते इसीलिए तुम्हे सब बदले बदले लगते ।।

फलक

फलक से जा उतरा चाँद उसकी छत पर,
उसे बांहो में लिपटे खुद भी रोने लगा
रोज ही तड़प के तू मुझसे कहता है अपनी कही अनकही
बस अब मुझे तेरा ये दर्द मंजूर नही
चल फलक तक एक तारा बना दु
किसी और के दिये है ये जख्म
इसमे कसूर तेरा नही
तू रहना मेरे करीब हर पल
चल उठ थोड़ा गमो से फलक भी सजा दु
ये सारा आसमा ले ले तू ये जमी अब तेरी नही

बहुत चमकीले है ख्याव

बहुत चमकीले थे ,कांच के ख्याव

बहुत चमके ,बहुत भाये हमे

रोज रोज देखते थे हम बड़ी आस लगाकर

एक रोज टूटे उसे जख्म हाथ से लेकर दिल तक आये