झूठी ज़िन्दगी

झांकते है मेरे शहर में

रास्ते जो तू दिखा दे

पर मृगमरीचिका से ,

जिन से आता है तू

रास्ता वो मुझे बता दे,

कुछ कह दे ,कुछ सुन ले

मन मेरा बहला दे ,

पर मृगमरीचिका है ये

लाता है कहा से आयात,

एक हरफ़ तो सच सुना दी

बेड़ी तेरी सख्त बड़ी है

ढीला गहना जरा बहना दे

पर मृगमरीचिका है,

लाता कहा से है तू ये जेबर

एक बेड़ी ला और पहना दे

तेरी दुनिया और कही है

मुझमे बस तू पल बहला दे

पर मृगमरीचिका है

छोड़ भले दे मुझे यही बस

तू बस वो सच बता दे

तितलियाँ

उड़ चली नीले गगन में,

जो नोंच दी ,खरोंच दी,

मासूम सी तितलियां,

पंख नही थे, रोता था अम्बर,

क्यों काँटो ने भेद दी तितलियाँ??

रंग बिरंगी थी ,भा गयी,

फूलों के धोखे

काँटो से टकरा गई

पर कटे ,टूटे फिर जिस्म

रात ने बुझा दी चिमनिया,

जमी रोई ,गगन रोया

क्यो मसल दी ये कलियां

उड़ चली नीले गगन में,

नोंचे दी खरोंच दी,

मासूम सी तितलियाँ????

क्या हुआ

क्या हुआ ??

क्या हुआ अगर कुछ गलती से कह दिया

क्या हुआ???

क्या हुआ जो थोड़ा मार दिया

क्या हुआ???

प्यार भी तो करता हूं

क्या हुआ ??

कुछ नही में

में ठीक हूँ

सब ठीक है……

दर्द कहा है

औरत हो तुम

दर्द कहा है??

क्या ख्वाहिश है???

क्यो थकती हो??

करती क्या हो??

किया क्या है??

क्या सपने है??

कौन अपने है??

कहा रहता है परिवार तुम्हारा??

कौन सा है घर तुम्हारा??

जाओ तुम अपने घर??

औरत का असली घर ससुराल है??

बेटियों पराई होती है??

तुम पागल हो??

अपनी औकात में रहो??

औरत हो तुम

अपनी जात में रहो??

थापड़ ही तो मारा है??

इतने में मर तो नही गयी ??

मेरी माँ को देखो

मेरी बहन से सीखो

क्या खोया है??

सब करते है??

औरत हो तुम अपनी हद में रहो??

दर्द कहा है??

औरत हो तुम

दर्द कहा???

बुलाती है मुझे

बुलाती है मुझे

कुछ बीते वक़्त के ख्वाहिशें

जिन्हें अब दफन कर दिया है

कुछ जिम्मेदारियों के नीचे

कई परते पीछा दी है

सब्र की लगभग भूल चुकी हूं

पर कभी कभी कुलबुलाती है

जेहन में,

तो याद आ जाता है

साँसे नही लेती में

बस ज़िंदा हूँ

बुलाती है मुझे फिर वो ज़िन्दगी

कांच के ख्याव

कांच के ख्याव है,

टूटने का डर भी है ,

कितने चमकीले है,

कुछ टूटे थे जिनके टुकड़े आज भी चुभते है

मगर कुछ और ख्याव देख लिए

क्या करे ये दिल है

दिमाग नही ,

नादानियां करता है बस

ख्यावो के टुकड़े चुभते बहुत है

ख्याव कांच के जो है

चुभने तो ,

अस्तित्व है ,

इंसानी सख्सियत के

चुभने दो,

तामीर करते है ,

कांच के ख्यावो को

पाक साफ है ,

ये ख्वाहिशो के साबुत

ये कांच के ख्याव