दुआ 

दुआए बहुत मांगी मैने खुदा से
मगर पूरी न कोई ,
एक रोज बस पूछा खुदा से,
शिकायत क्या है जो मेरी दुआ तक कुबूल नही
मुस्कुरा के खुदा बोला दुआ तो मांगी तुमने,
मगर दुआ में भी तो मांगों कुछ

दुआएं

दुआएं मेरी सारी खाली खाली चली जाती है
नाराजी किसी की इतनी है ,दुआयों का असर होता नही
जमाने भर की गलतफहमी है दोनों है दरमियां,
कुछ लोग भी है जो और बढ़ने से बाज़ आते नही
न हम कहते है ना वो सुनते ही ,
और जब नज़रो से कहना चाहा तो वो नज़रे मिलाते नही
वाकये बहुत है जो कहने थे मुझे
खमोशी से भी तो ये शिकायतें कही जाती नही
न तू कह ,न में कहु
कहने सुनने से अब ये फासले खत्म होते नही
चलो एक साथ चलते है उस खुदा के घर
कुछ तुम मांग लेना उससे माफी ,कुछ हम देंगे जो लफ्ज़ो से हम बताते नही
ख्याब रोयीं बहुत है इन अमावास की रातों में ,
उजालों की तो बस ख्वाहिश है ,पर ये अंधेरे दूर उससे जाते नही

जुगनू

जुगनुओं की भी अमा यार! कितनी शिकायतें है
की रोज रोज अँधेरे में चले आते हो ,
की उजाले क्यो नही लाते हो
कौन कहता था
की एक चिराग़ लेकर के चलती है जुगनू
अंधरे में अपनी रोशनी ढूढ़ने को
हम जब जब मिले ये जुगनू
तो बस रोशनी की तलाश करते मिले
कितने नादाँ है ये
चारगो के मालिक
रोशनी की विरासत लेकर रोशनी के
कतरे ढुढते रहते है
कितने नादाँ है ये
इन्ही की रोशनी में
में आजकल खुद को तलाशती हूँ
शायद कुछ कुछ मेरी तलाश भी जुगनू जैसी है
कोई तो कतरा छुपा है इस दिल की गहराई में
जो मुझिसे मेरी तलाश करवाता है शायद
में भी खुद को ढूढ लूँगी
शायद

#सपना विवेक चौधरी #☺

दर्द है शायद

ख्याब में एक ख्याल आया,कुछ नए रंग लेकर
पर जमी कहा है ?इनके लिए
दर्द से सारी जमी खुरदरी है
कहा सजेंगे फिर ये रंग
फिर क्या करूँ रंगों का
चलो पहले एक ख्वाहिशों का शामियाना लगती हूँ
दर्द फिर नही दिखेगा
फिर रंग भर दूँगी
अपने पसंद के,,,,,,,,,,,,,
कुछ छोटी छोटी ख्वाहिशे रखूंगी
पर……..
उस जमी पर पैर रखूंगी तो दर्द होगा ?
पर नई जमी तैयार करनी है दिल की
दर्द तो थोड़ा होगा
और फिर ये नए रंग मुझे
मुस्कुराना सीखा देंगे
शायद….
कोशिश करनी होगी मुझे
कोशिश करती हूं
कुछ धीमी धीमी आवाजें
शोर
सन्नाटा
अँधेरा
और
ख्याव का टूटना
ख़्याल सारे तिलस्मी
कुछ चुभ गया फिर
बाँये कंधे के नीचे
शायद
दर्द है जो रग रग में बह रहा है
सुइयों से तैर जाता है
रग रग में
दर्द है शायद
दर्द………………………

भिखारी

सारे पंडित ,सारे काजी

उस रोज एक छत के नीचे जा पहुचे

जब वो भिखारी मरा 

ना मालूम हिन्दू था कि मुसलमान

बस सब ने उसे देखा था 

नबजो में दुआ करते 

और मंदिर में 

किस मजहब किस कोम का था

कोई नही जानता था

क्योकि ,

थोड़ा तल्ख़ मिजाज था

या तो मंदिर में देखा था भक्त ने

या मस्जिद में किसी नाबाजी ने 

भिखारी था 

फिर क्यों परेशानी का सबब था??

था शायद??क्योकि मर गया था

अगर मुसलमा था तो जन्नत जाएगा

चारो पहर की नाबजे करता था ,

और

था अगर हिन्दू तो निश्चित स्वर्ग का हकदार था

हर आरती में शामिल जो था 

नंगे पैर सीढ़िया चढ़ता था,

मरा तो एक चादर में लिपटा था

न मालूम कि हिन्द है कि मुसलमान

पंडित बोले

भगवा पहने होता तो निश्चित हिन्दू था

काजी भी बोले 

देखो कोई हरे रंग कपड़ा है क्या??

नाबाजी टोपी है क्या??

दो धर्मो की बात थी

इसीलिये शायद ??

भिखारी मरकर भी जिंदा था

और उसकी मौत पर हिन्दू भी शर्मिंदा था और

मुसलमा भी शर्मिंदा था

सारे पंडित , सारे काजी शिनाख्त में लगे थे

पर छूने का धर्म किसी का न था

ठिठुरा चादर में में लिपटा कुछ यूं मरा

पीठ के अलावा

न काजियों को कुछ नज़र आया और

न पंडितों को

फिर क्या किया जाए शिनाख्त के लिए

दो धर्मो की बात है

पंडित और काजियों ने एक गरीब को बुलाया

जिसका धर्म,मजहब, जात सब पैसा था

गरीब ने भिखारी को छूकर देखा 

तो जैसे कुछ वह रहा था

सांस शायद अब भी बाकी थी

ठंड से धीरे धीरे मर रहा था

गरीब ने फटे कम्बल में लिपेटा

काजी बोले अच्छा है पता तो चले कोन है

पंडितों ने पूछा 

बाबा हिन्दू हो क्या??

भिखारी ने न में सिर हिला दिया 

और पंडितों की आरती का समय भी हो गया 

एक धर्म गया अपने भगबान की सेवा में

काजियों ने फिर पूछा

बाबा मुसलमान हो क्या ??

भिखारी ने न में सिर हिला दिया

और काजियों की भी नाबाजो का वक़्त हो गया

बेचारा भिखारी और गरीब 

शायद एक ही धर्म के थे उनके मजहब इस दुनिया मे नही थे

एक मर रहा था 

और दूसरा जीने की कोशिश

कर रहा था

गरीब और गरीब हो गया अब फटा कम्बल भी उसके पास नही था

गरीब ने भी भिखारी से पूछ लिया

बाबा किस जात धर्म से हो

और भिखारी ने सिर्फ एक शब्द कहा ‘इंसान ‘

और एक मैली सी थैली गरीब को थमा दी,

जिसमें दो धर्मो की कमाई थी

कोई भी धर्म नही था

भिखारी मर गया गरीब बेचारे ने मन्दिर को 

खबर की

मस्जिद में भी खबर दी

पर भिखारी का धर्म अब भी नामालूम था तो

कोई नही आया

गरीब ने भिखारी का अंतिम संस्कार किया

उन्ही पैसो से

और बचा हुआ पैसा भिखारियों में बांट कर

अपनी रोटी की तलाश में निकल गया

क्योकि 

भूख की कोई भी जात नही होती धर्म , नही होता और मजहब नही होता 

बस वो होती है !!

ख्वाहिश

1.अपनी ख्वाहिशे इतनी भी बड़ी मत करो
की किसी की जरूरतें छीन ले!!
2.आसमा से आसमा नही देख पाओगे
जमी पर आकर आसमा भी नज़र आएगा
और मक़ाम भी
बेशक आसमा को देखो मगर जमी की कीमत पर नही।।।

मुअनजोदरो(मुर्दों का टीला)

एक इतिहास समेटे, एक इतिहास बना

सीने में कई राज दबोचे ,देखो मुर्दों का टीला

मुअनजोदरो प्राचीन नगर ,इतिहास की शिला 

विकास क्रम आश्चर्य है , कितना विकसित मिला

अन्न धन धान्य था ,क्या थी फिर वो बला

कैसे वीरान हुआ मुअनजोदरो ,मुर्दो का टीला

दुरुस्त थी नगर प्रणाली ,शासक न कोई मिला

क्या था वो कारण ?, कैसे विनाशक्रम चला

क्या कोई बाढ़ वहाँ आई थी ,या थी किसी जुर्म की सजा

विध्वंस कैसे हुआ, क्यो ऐसे वीरान मिला

कैसे था वो नगर बसा, क्या था वहाँ कोई किला

जन-जन का था प्रजातंत्र, अस्तित्व में है मौजूद शिला

क्या कहते है अब ये वीराने,मानव के अस्तित्व से

सदियों पहले हम विकसित थे ,फिर तुमने नया क्या किया

प्रणालियाँ दुरुस्त थी, विकसित थी सभ्यता 

विश्व पटल अस्तित्व था, खोजा वो जो क्या न मिला??