दर्द कहा है

औरत हो तुम

दर्द कहा है??

क्या ख्वाहिश है???

क्यो थकती हो??

करती क्या हो??

किया क्या है??

क्या सपने है??

कौन अपने है??

कहा रहता है परिवार तुम्हारा??

कौन सा है घर तुम्हारा??

जाओ तुम अपने घर??

औरत का असली घर ससुराल है??

बेटियों पराई होती है??

तुम पागल हो??

अपनी औकात में रहो??

औरत हो तुम

अपनी जात में रहो??

थापड़ ही तो मारा है??

इतने में मर तो नही गयी ??

मेरी माँ को देखो

मेरी बहन से सीखो

क्या खोया है??

सब करते है??

औरत हो तुम अपनी हद में रहो??

दर्द कहा है??

औरत हो तुम

दर्द कहा???

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बुलाती है मुझे

बुलाती है मुझे

कुछ बीते वक़्त के ख्वाहिशें

जिन्हें अब दफन कर दिया है

कुछ जिम्मेदारियों के नीचे

कई परते पीछा दी है

सब्र की लगभग भूल चुकी हूं

पर कभी कभी कुलबुलाती है

जेहन में,

तो याद आ जाता है

साँसे नही लेती में

बस ज़िंदा हूँ

बुलाती है मुझे फिर वो ज़िन्दगी

कांच के ख्याव

कांच के ख्याव है,

टूटने का डर भी है ,

कितने चमकीले है,

कुछ टूटे थे जिनके टुकड़े आज भी चुभते है

मगर कुछ और ख्याव देख लिए

क्या करे ये दिल है

दिमाग नही ,

नादानियां करता है बस

ख्यावो के टुकड़े चुभते बहुत है

ख्याव कांच के जो है

चुभने तो ,

अस्तित्व है ,

इंसानी सख्सियत के

चुभने दो,

तामीर करते है ,

कांच के ख्यावो को

पाक साफ है ,

ये ख्वाहिशो के साबुत

ये कांच के ख्याव

कोशिशें

कोशिश करती हूं
अपने कद से ऊँचा उछलने की
स्त्रीत्व में बंधे हुए
कुछ सपनो के परिदों को आसमा में आजाद कर दु
स्वप्न परिन्दों को पलको में छुपाया है अभी
बस आजाद करना है
पर डर है कही उन्हें देख कर कोई न मार डाले
छोटे छोटे ख्याब है
जीने के
मगर आजाद देखे है
बस वही डर है
कहा अच्छा है ख्यावो का यू आजाद रहना
और वो भी औरत के
नही नही ……………
श श………………कोई सुन न ले मैंने सुन लिया
चलो छुपा लू पलकों में अपनी
पलकों में सही ज़िंदा तो रहेंगे
कोई खत्म कर दे उससे अच्छा है
आंखों में लेकर ही मरु
में मेरे ख्याव
कोशिश करुँगी फिर कभी
किसी और के पूरे हो
ख्याव जरूरी है
ज़िन्दगी के लिए
कोशिश तो करनी होगी ही

मुझे नीद आती है

घास के तिनको पर एक रात को बना लिया बिछौना
नीद को काबू में करने चाँद को कुछ धीमा करके
बदलो के पीछे छुपा दिया है
बस टिमटिमाते तारो की धीमी रोशनी में,
शब आगोश में ,
शजर माथे को सहला कर लोरिया गाते ,
चली आओ अब तो तुम सारे इंतजाम कर लिए है,
बस तुम्हारा इंतज़ार है
क्योकि कुछ हकीमो ने कहा है
मुझे नीद नही आती है
रात भर जागकर कौन सोता है भला
कुछ लोगो ने भी कहा है
तुम्हे नीद नही आती
सारे इंतजाम आज कर लिए तुम्हारे लिए
बस आ जाओ तुम
मुझे भी कहना है तमाम लोंगो और हकीमो से
तुम मुझे भी आती हो
मुझे नीद आती है
मगर चुपचाप ही हम दोनों जागते जागते बतियाते है
न”” खुद ख्याब “”सोती है
और नीद को रात भर जगाती है
में कह दूँगी फिर मुझे नीद आती है
मुझे नीद आती है

कल रात चाँद

कल रात चाँद से कहा था

कितनी दूर हो तुम पर कितने नजदीक लगते

गुमसुम हो फिर भी कितना कुछ कहते

जब तक रहू में आशिया की छत पर

तुम मेरे हर पल पास रहते

तुम यकीन हो मेरा की सबसे बड़ा भरम

चाँद ने कहा मुझसे ,,,,,में वही हु जो सब के लिए है

तुम बदलते इसीलिए तुम्हे सब बदले बदले लगते ।।