तुम ही हो बस

नीदों मैं निकल जाती हूँ ख्याव लेकर , तलाश मेरी तुम ही हो बस

थक हार कर लौट आती मेरे पास नींद, मेरी दुनिया मैं तुम ही हो बस

बहाने बहाने अब दिल भी करता है तुम्हे ढूढ़ता रहता ,

धड़कन बन गए हो ज़िन्दगी मेरी अब तुम ही हो बस

#सपना विवेक चौधरी,😊😊

रोज रोज 

अरे यार फिर वही रोज रोज 

रख लिया सारा समान 

अमा !यार फिर वही रोज रोज

कहना सब रख लिया न !

बही तुम्हारा रोज रोज

तुम्हारी याद के लिए भूले है हमने  कुछ समान 

फिर बही शिकायती लहजा भूलते हो तुम रोज रोज

याद जो तु दिलता है , बही छोडते है 

तेरी याद के लिए हम रोज रोज

क्या कहे कि तू नही भूलता मुझे ,

इन्ही चीजों रोज रोज

तो अच्छा है कि मै भूल जाता घङी,पर्स ,रूमाल  याद से रोज रोज

याद दिलाने को याद रखता है मुझे तू रोज रोज

और गर तुझे लगता है की सच मै भूल जाता हूँ मै रोज रोज

तो क्या लौट.कर वापिस आती वो सारी चीजे

जिन्हे याद दिलता है तू मुझे रोज रोज

मुझे अच्छा लगता है 

भूल जाना सब कुछ तेरे पास ही रोज रोज

फिर वो तेरा कहना ,

कौन भूलता है रोज की चीजे रोज रोज

#Sapna vivek choudhary

तेरी कमी

तेरे जिक् में ये महफिल रोती नही

मुझे अब तेरी कमी उतनी भी होती नही

उतार लाया हूँ आसमा से चाँद ,तारे

अब जमीं को भी  नाराजी मुझसे होती नही

जुगनूओ का साथ है मुरशीद हूँ मैं 

टिमटिमाते है तो तेरी  ऑखो कि कमी होती नही

गुस्ताखियाँ मैने कि बहुत पर एक तूने कर दी

यूही किसी को छोङकर दिल से रवानगी होती नही

मुझे मालूम है, तू जानता है मुझको अब भी

मुँह फेर लेने से अजनबी हसतियाँ होती नही

मना मना कर भी न माना तू , मै खफा हो गया खुद से

तुझसे कर लेता हूँ मिन्नते बार बार ,खुद से एक बार भी होती नही

रोज रोज के बहानो से पंरेशा हूँ ऐ दिल

मुझसे भूलने कि ये तरकीबे अब होती नही

लिखे थे चँद लफ्ज तेरी याद मै पङता रहता हूँ

बस तुझसे कहने हिम्मते मुझसे होती नही

आईना

आईनो पर इतनी धूल अच्छी नही

इन्हें थोङा साफ करके रखिये 

तासीर है ,सिरत है तुम्हारी

इस पर इतनी धूल अच्छी नही

धूधंला धूधंला ही सही नजर आ जाऐगा

यू ही फिर ये असि्तत्व की तासीर अच्छी नही

मुस्कुराने की हिम्मते होती सब मे,

पर यू ही जी चुराने कि आदात अच्छी नही

रुबरू हूँ मैं , मुक्कमल भी हूँ,

मगर जहाँ से यू बेरुखी अच्छी नही

उसने किसी के ख्याल मे आईना देखा

मगर आईनो से यू ही दिल्लगी अच्छी नही

सब लेकर घूमते दिल मै आईना,

मगर  उस पर ये राज-ऐ-धूल की परते अच्छी नही

झाङ दो दिल से ये धूल की गरदें

दिल मैं कुछ यू गंदगी अच्छी नही

देख पाऒगे फिर खुद को, हर सिकन को भी

खुद से यूही गम छिपाने कि आदात कुछ अच्छी नही

रोज-रोज ही निकल जाती है’ख्याब’ मंजिल कि तलाश मै

कुछ खुद मै भी रहो यू ही यायावरी अच्छी नही

तेरा जाना

बहुत हुआ तेरा हर बात पर उठ कर चले जाना

में बस देखती हुँ क्या ये सहुलित है 

मुझसे दुर जाने की,

हम किनारे भी रहे नदी के तो क्या बूरा होगा

बहने दो मुझे और तुम भी बहो,

क्या शिकायत ये कह दो मुझे,

क्या जररत है हर बात पर उठ कर चले जाने की

प्यार हो गया

इश्क ,मोहब्वत नही उसे प्यार हो गया

सुफियाना सा है थोडा यार हो गया

इश्क ,मोहब्बत नही उसे प्यार हो गया

काबा, मदिना सारे मंन्दिर लगे ,उसे

उसकी ऑखे समन्दर लगे

दीवाना थोडा पागल वो हॅसने लगा

उसे सारे डाकु कलंदर लगे 

जब से उसे इस बात का इम्तीनान हो गया

इश्क ,मोहब्बत नही उसे प्यार हो गया