कांच के ख्याव

कांच के ख्याव है,

टूटने का डर भी है ,

कितने चमकीले है,

कुछ टूटे थे जिनके टुकड़े आज भी चुभते है

मगर कुछ और ख्याव देख लिए

क्या करे ये दिल है

दिमाग नही ,

नादानियां करता है बस

ख्यावो के टुकड़े चुभते बहुत है

ख्याव कांच के जो है

चुभने तो ,

अस्तित्व है ,

इंसानी सख्सियत के

चुभने दो,

तामीर करते है ,

कांच के ख्यावो को

पाक साफ है ,

ये ख्वाहिशो के साबुत

ये कांच के ख्याव

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14 thoughts on “कांच के ख्याव”

  1. कुछ टूटे थे जिनके टुकड़े आज भी चुभते है

    मगर कुछ और ख्याव देख लिए

    क्या करे ये दिल है

    दिमाग नही ,
    bahut khub likha Sapna ji….

    Liked by 1 person

      1. You are welcome…:-)
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